दबी हुई जुबां
लम्हा लम्हा बीत रहा उम्र ढल रही लेकिन आज भी इस सीने में दबी हुई जुबां रातों को सोने नहीं देती।कहते है वक्त हर मर्ज की दवा है लेकिन कुछ ऐसे दर्द है जिसकी कोई दवा नहीं।
कुछ लोग कहते है हमें अपने कल को छोड़ आगे बढ़ना चाहिए सच भी है लेकिन क्या करे इस दबी जुबां का जो हर मोड़ पे याद दिलाती है की जो आज है तू वो कल की वजह है ।
इस कोरे कागज़ के टुकड़े उस लम्हे को कैद तो कर सकते लेकिन उसे जी नहीं सकते।शायद ही मैं गलत थी उस वक्त लेकिन उस नन्हे दिल को कैसे समझाऊं जो दिल ही दिल में ना जाने किन जज्बातों को लेकर बैठा था दबी हुई जुबां के साथ।
ना जाने कितने डर थे कितने सपने और न जाने कितने हकीकत जिनका सामना करना था उस नन्ही जान को दबी हुई जुबां को लेकर।ये जज़्बात शायद हमें विरासत में मिली थी अपनी मां से जो उसके आंसू देखकर खुद ही पिघल जाया करती थी।उसके साथ बीते हर पल को समेटना चाहती थी की फिर ये मिले ना मिले ,उसके हर दर्द को अपना बनाना चाहती थी।
लेकिन ये मुमकिन न था क्योंकि कुछ पाने के लिए हमें कुछ खोना पड़ता है और बहुत कुछ पाने के लिए बहुत कुछ सहना पड़ता है।कुछ ऐसा ही था जिसने हमें सिखाया उस नन्हीं सी जान को हरे लाल कागज़ की कीमत उसकी अहमियत और उसे पाने के लिए कुछ कर गुजरने की चाहत।
बस फिर क्या था उस दबी हुई जुबां ने सपने देखे और उस ऊपरवाले ने उसकी नीयत फिर क्या था वो सब उसे मिला जो भी उसने चाहा दबी हुई जुबां से।
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