wo jati hui train...

 वो जाती हुई रेलगाड़ी

वो रेलगाड़ी चल पड़ी थी, वो भी दौड़ता हुआ उसे पकड़ने के लिए निकल चूका था। वो जा रहा था लेकिन उसे मुझसे बिछड़ने का गम नहीं था। वो खुश था बहुत खुश था। बहुत दिनों बाद वो अपने घर को लौट रहा था। वो बहुत दिनों  बाद अपने परिवार से जो मिलने वाला था। उसे अपने दोस्तों को मिलने की ख़ुशी थी। बस कुछ मिनटों के लिए मिले थे हम। उसे अफ़सोस न था। उसे छोड़कर जाने का अफ़सोस  न था। 

हां मुझे अफ़सोस था उसके जाने का। हां मैंने सोचा न था वो इतनी जल्दी चला जायेगा।  हां मैंने कुछ और पल साथ रहने का सोचा था लेकिन वो रुका नहीं।  वो चला गया।  मैं उसे जाते हुए देखती रह गयी उसे पता भी न चला। कई घंटे मैं उसी अवस्था में खड़ी थी.. 

 एह्सासों में जीना और बारीकियों को समझना मेरी एक वक़्त के लिए ताकत थी जिसकी वजह से मैँ  खुद के लिए सही निर्णय ले सकती थी लेकिन अब ये मेरी कमजोरी बन चुकी थी। मुझे दर्द होता था लेकिन फिर भी मैं इसे सहने को तैयार थी। सबकुछ जानकर समझकर भी खुद को रोक नहीं सकती थी।  ये कोई पहली बार नहीं था जब उसने मुझे इग्नोर किया था।  लेकिन फिर भी मैं खुद को कमजोर बताकर पीछे नहीं होना चाहती थी। 

बहुत दिनों बाद हम मिलने वाले थे। उसका मोबाइल रिपेयर के लिए दिया था। मैंने उस मोबाइल को देने के बहाने मिलने का प्लान बनाया था। मैंने रात की ट्रैन ली और उसने भी एक दिन पहले ट्रैन लिया था। मैं सुबह के ६ बजे स्टेशन पहुंच चुकी थी। उसकी ट्रैन लेट चल रही थी। मैंने इंतज़ार करने लिए  मंदिर को चुना। न जाने कितनी मुश्किल से ये वक़्त गुजर रहा था। ट्रैन भी मानो आज कसम खा रखा हो जल्दी न पहुँचूँगा। गुस्सा आ रहा था। इन्तेजार की इन्तहा हो चुकी थी। मेरी ट्रैन  रात के ९ बजे थी और उसकी ट्रैन सुबह ९ बजे पहुंचने वाली थी। ट्रैन कमबख्त लेट ही चली तो लेट ही पहुंची। ट्रैन दिन के १२ बजे पहुंच चुकीं थी। और उसकी घर के लिए ट्रैन आधे घंटे बाद थी। वो आया और हम मिले बहुत दिनों बाद लेकिन ऐसा लगा जैसे वो बदल चूका है। अब वो इंसान नहीं जिसे मै जानती थी.

अब उसकी आँखों में वो बात नहीं थी मेरे लिए जो पहले थी। उसने अपनी ट्रैन पकड़ ली। मैंने भी उसे रुकने को नहीं कहा। वो जा रहा था और मैं उसे जाता हुआ देखती रह गयी.... 

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