wo jati hui train...
वो जाती हुई रेलगाड़ी वो रेलगाड़ी चल पड़ी थी, वो भी दौड़ता हुआ उसे पकड़ने के लिए निकल चूका था। वो जा रहा था लेकिन उसे मुझसे बिछड़ने का गम नहीं था। वो खुश था बहुत खुश था। बहुत दिनों बाद वो अपने घर को लौट रहा था। वो बहुत दिनों बाद अपने परिवार से जो मिलने वाला था। उसे अपने दोस्तों को मिलने की ख़ुशी थी। बस कुछ मिनटों के लिए मिले थे हम। उसे अफ़सोस न था। उसे छोड़कर जाने का अफ़सोस न था। हां मुझे अफ़सोस था उसके जाने का। हां मैंने सोचा न था वो इतनी जल्दी चला जायेगा। हां मैंने कुछ और पल साथ रहने का सोचा था लेकिन वो रुका नहीं। वो चला गया। मैं उसे जाते हुए देखती रह गयी उसे पता भी न चला। कई घंटे मैं उसी अवस्था में खड़ी थी.. एह्सासों में जीना और बारीकियों को समझना मेरी एक वक़्त के लिए ताकत थी जिसकी वजह से मैँ खुद के लिए सही निर्णय ले सकती थी लेकिन अब ये मेरी कमजोरी बन चुकी थी। मुझे दर्द होता था लेकिन फिर भी मैं इसे सहने को तैयार थी। सबकुछ जानकर समझकर भी खुद को रोक नहीं सकती थी। ये कोई पहली बार नहीं था जब उसने मुझे इग्नोर किया था। लेकिन फिर भी ...